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Monday, May 10, 2010

त्रिवेणी ग़ज़ल

फिर कोई खलिश मुझे, जागती है रात भर ।
तीरगी* में रास्ता, ढ़ूंढ़ती है रात भर ।
तमन्ना दीवारो - दर , पीटती है रात भर॥

ज़ख्म से बहता हुआ , खून क्यों खामोश हो ।
आरज़ू दिल की बहुत , बोलती है रात भर ।
हर तरफ खला में पर तौलती है रात ॥

ये फितूर है मेरे , तालि - ए - बेदार** का।
तेरी चाप की सदा , गूंजती है रात भर।
कान में सरगम शहद , घोलती है रात भर॥

आरज़ू में डूब कर,घुल रहे हैं नक्शो-नक्श।
शै कोई तस्वीर सी , भीगती है रात भर ।
हसरते जां आँख में , तैरती है रात भर॥

चुन रहा हूँ सुब्हो मैं , मोतियों से हर्फो-हर्फ़।
एक दरिया सी ग़ज़ल , फैलती है रात भर।
तुम कहाँ हो ?मैं कहाँ?पूछती है रात भर॥

(दीपक तिरुवा )

*अन्धकार , ** सौभाग्य


2 comments:

दिलीप said...

nayaab gazal bahut khoob...

Arun sathi said...

अच्छी गजल.