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Thursday, July 21, 2011

*मिराज़*

क्या तुमने
सड़क पर मिराज़ बनते देखा है?
हाँ मैंने
सड़क पर मिराज़ बनते देखा है.
...जून की इक
गर्म दोपहर
मैंने एक
ख़ूबसूरत
लड़की से कहा,
" ज़िंदगी लम्हों में जीना अच्छा होता है..!
मैं और तुम
घड़ी भर के सफ़र में हैं
और घड़ी कमबख्त
दीवार पर
टंगी रह कर भी
चला करती है.
अगर
किसी रिश्ते में यूँ हो
कि तुम,
बिलकुल
तुम रह सको
और मैं,एकदम मैं...
तो रिश्ते में इस आज़ादी को,
'मैं प्यार कहूँगा'.
प्यार के बस लम्हें मिलते हैं.!
ज़िंदगी लम्बी,रूखी है,
डामर की इस काली सड़क की तरह.
धूप जलती हुई है,
हवा नासाज़,
लेकिन दूर.....
इस सड़क की सतह पर
पानी सा झिलमिला उठा है!"
उसने बेयक़ीनी से देखा
पानी,
फिर मुझे.
और जाते हुए
हंस कर कहा,
"तुम बातें बहुत अच्छी करते हो !"
मुझे
इतना सा
और कहना था,
" ज़िंदगी लम्हों में जीना मुश्किल होता है !"
हाँ मैंने सड़क पर
मिराज़ बनते देखा है.
______(दीपक तिरुवा)______
------------*मिराज़*----------​-----
___------मृगतृष्णा ,मरीचिका----__

Saturday, November 14, 2009

फेमिनिस्ट

अनुभव अगर कहूँ ,
तुम छीन लोगे मुझसे
'फेमिनिस्ट'
कहलाने की खुराक !
चलो मैं इसे
शोध कहता हूँ
मैंने तमाम
साहित्य
खंगाला है,
इतिहास की
कब्र
खोदी है
और यकीनन
मैं नहीं कहता,
आंकडे बोलते हैं
औरत में आदमी का हर एक फन है
आदमी की टक्कर का काइयांपन है
उठो नहीं...भड़को मत ...
ये शोधपत्र ले जाओ
अपने 'तंत्र ' को समझाओ
औरत से डरने की
ज़रूरत
नहीं है,
औरत भी अपनी है/
पराई
नहीं है...

Wednesday, November 11, 2009

उठो !

साथियों उठो!
तुम नहीं जानते
क्या हुआ है?
तुम पथरीले खेतों में
सोना उगाने की
कोशिश करते हो..
और लोहा समझ कर
सरहद पर भेजते हो
अपने बच्चे....
तुम नहीं जानते
बच्चे लोहे के नहीं होते...
वे सरहद पर लोहा खाएँगे।
वे शहीद नहीं
सियासत के हाथों पिटे हुए
मोहरे होंगे...
और कल सरकारी दफ्तरों में
तुम्हारी बदहवाश बहुएँ
किस 'एंगल और फ्रेम' से
देखी जायेंगी ?
तुम नहीं जानते!
इसलिए उठो !
अपने पथरीले खेतों में
अब सोना नहीं...
लोहा उगाओ..!

(published)

Wednesday, July 8, 2009

कालिदास लौट जाएगा ...

आँख खुलती है सुबह
तो देखता हूँ
सिर के दर्द की तरह
पूरब से उगता ,आग का गोला।
रात की बहस-
दिन के काम याद आते हैं,
चौबीस घंटे के
संकरे से थैले में
क्या-क्या ठूंसना पड़ता है?
यही सोचता हुआ
उठ पडूंगा,
सिगरेट सुल्गाऊंगा ,
पैर में उलझती
चप्पल को लात मारूंगा,
गली में भौंकने वाले
कुत्ते को गोली मारने की
क़सम खाऊंगा।
एक आध पल ढंग से
जीने के लिए
एक -एक सरकते सेकेण्ड पर
कील ठोंकने की
कोशिश करता हूँ
संभावनाएं होनी चाहिए
आदमी में मोहब्बत के लिए,फिर भी....
मैं वो आदमी हूँ जिसने
विद्योतमा से प्यार किया...!
उसने स्कूल में पढ़े ,
,, ...!
कमजोरी ,खतरे ,
गरीबी के साथ
मैं बस्ती में रहा हूँ ,फिर भी...
उसे चलना है समय के साथ
दिन रात के जंगल
मुझे काटने हैं ,फिर भी...
वो विद्योतमा है
चाहे तो
भी सकती है ,
मैं मगर बन सका 'कालिदास'
तो पुरानी ही बस्ती में
लौट जाऊँगा...

Sunday, May 3, 2009

सुनो ...! बन्दर से बने हुए 'डार्विन'...


सुनो कान खोल कर
बन्दर से बने हुए डार्विन...!
तुमने ये 'जंगल का कानून' लिखा है।
सभ्य समाज में तुम्हारा
'सर्वाइवल ऑफ़ दि फिटेस्ट '
कुछ नहीं होता।
'सब बराबर होते हैं ',
'मिलकर जीते हैं '
कोई कमज़ोर का हक़ नहीं मारता.....
सभ्य समाज में
'शॉपिंग मॉल' नहीं होते,
कोई पॉँच सितारा में नहीं खाता,
किसान खुदकुशी नहीं उगाते,
किसी का पेट रीढ़ से नहीं चिपकता ।
लोग 'स्वीमिंग पूल ' नहीं पहचानते,
कारें हवा से धोते हैं ,
पब्लिक नल पर खून नहीं बहता।
आदमी... औरत जात के लिए
कैंसर नहीं होता ,
सचमुच का कैंसर होने के दिन
औरत अपना
'बर्थ डे' नहीं मनाती।
सभ्य समाज में
रिक्शे नहीं चलते ,
जनता के नुमाइन्दे
'वी आइ पी' नहीं होते ....
और 'मजदूर दिवस '
तुम्हारे जंगल के युग की बात है ....
सुनो कान खोलकर
बन्दर से बने हुए 'डार्विन'.....
(दीपक तिरुवा)

Friday, May 1, 2009

गाँधी , संविधान और माओ...

हम क्या करेंगे
इसे तय करने वाले
गाँधी ,संविधान या माओ...
कौन होते हैं ?
ये हमारे सूखे हुए पेट
और आप के
भरे हुए बाजुओं का किस्सा है ....
आप सोचते हैं
हम क्या खा कर करेंगे 'मोहब्बत' ?
हम जानते हैं
'संघर्ष' आप के बस की बात नहीं....
मोहब्बत बाजुओं-बाँहों का
लहलहाना भर नहीं है,
दो सूखे पेट
इकलौती रोटी को बाँट भी सकते हैं।
इसलिए
बिन पढ़े खाने दीजिये
मोहब्बत लिखी रोटी
सूखे पेटों को ....
वगर्ना हम क्या करेंगे ?
इसे गाँधी संविधान या माओ ,
तय नहीं करेंगे....

Friday, April 3, 2009

ज़िन्दगी-ज़िन्दगी !(अखंड)

मैं मरना चाहता था ,
मैंने देखे मौत ,दुःख, निराशा
पस्तहिम्मत ,मतलब परस्त लोग
ज़िन्दगी समझौतों में जीते लोग,
बिखरी ज़िन्दगी ,
सबकुछ जीवन विहीन.....
मैं अब जीना चाहता हूँ
अनंत समय तक
मैंने देखे जीने को कुलबुलाते लोग
ज़िन्दगी के पहलू ,दुनिया की सुन्दरता
बच्चों के हाथों की कोमलता
महसूस किया मैंने
हर इन्सान में छुपी संघर्ष की अदम्य इच्छा को
सच ,अब मैं बिल्कुल मरना नहीं चाहता
मौत अब तू मेरे क़रीब
मैं तेरे चेहरे पर जीवन के
गीत लिखना चाहता हूँ

Thursday, March 19, 2009

भूख...!/दुर्बी

फ़ाकों के क्या हाल सुनाऊँ ...?
मेरे घर का सूना चूल्हा
कब से मुझको ताक रहा है ।
घर के सारे टीन -कनस्तर
दाना -दाना तरस रहे हैं ।
सुख-दुःख के साथी थे चूहे ,
वे भी तनहा छोड़ चुके हैं ।
गलियों का आवारा कुत्ता तक
उम्मीदें छोड़ चुका है ।
सुबह शाम का उसका आना,
जाने
कब का छूट चुका है ।
मिलने पर भी उसकी दुम अब ,
पहले जैसी कब हिलती है ?
वो अपने अन्दर के कुत्ते को
मार चुका है और ढूंढ़ रहा है
अपने भीतर के मानव को...!
उसने भी बस्ती में जीना सीख लिया है ।

Saturday, February 28, 2009

ताजमहल और नमक ...!/दीपक तिरूवा

तुम सुनोगी तो हंसोगी,
मेरे दोस्त शाहजहाँ ने
ताजमहल
बनवाया है
तुम्हें यक़ीनन डाह नहीं होगी
किसी मुमताज से
तुम
जानती हो मैंने तुम्हें
दाल
में नमक की तरह चाहा है
हम आम-अवाम ,
किसी महँगी तामीर से
अपनी मोहब्बत के
अलग
या ख़ास होने का
दावा नहीं करते लेकिन....
काँप
उठेगा शाहजहाँ गर
संगेमरमर की खदानों की तरफ़
मैं निकलूं
और मुमताज
रोज़ जला करती है तुमसे
आख़िर

दाल
में नमक तो उसे भी चाहिए ....!

Wednesday, February 25, 2009

बूढा ...!/दीपक तिरुवा

चीथडा़-चीथडा़ एक बूढा ,
आँखें टँगीं हैं क्षितिज पर ।
झुर्रियों में
दफ़्न अतीत,
वर्तमान घावों से रिस रहा है ।
जा-ब-जा उधड़ी हुई चमड़ी की
पतली तह के नीचे
ये बूढा सफ़ेद हड्डियों का
एक जंगल रखता है।
बेतौर-बेतरतीब बढ़ी हुयी हड्डियाँ
हड्डियाँ त्रिशुलों में ढल गई हैं ।
बन गई हैं तमंचे ,तलवार और बम।
और बूढे का अपना ही कंकाल
रहे सहे ढांचे को नोच रहा है ,
काट रहा है ,और जला रहा है।

Friday, February 20, 2009

औरत... /मीना पाण्डेय

मैं चलती हूँ /जलती हूँ ।
तड़पती हूँ /दिन -रात ।
मैं ,सुबह हाथ /दिन में मस्तिष्क /रात में देह होकर/
भोजन ,कमाई.... और कभी स्वयं को परोसती हूँ उसके आगे।
मैं सिर्फ़ मैं बनने को/ बड़े सवेरे उठ कर तैयार करती हूँ,
उसकी ज़रूरत का सारा सामान ,
जब वो बिस्तर पर हाथ -पैर पसारे गर्म सासें भरता है ।
वो अपनी दुनिया के हिसाब से /
मांग करता है चाय की एक गर्म प्याली की,
देरी होने पर कई तरीके से/
पुष्टि करता है अपने पौरुष की ।
हम दोनों साथ -साथ घर की चौखट लाँघते हैं/
फाइलों में खोजने देश का भविष्य..../
लेकिन घर पहुँचने पर /
साडी का पल्लू कमर में मैं ही खसोटती हूँ
फिर भी उसके सिर्फ़ साथ चलने को मैं सबसे तेज़ भागती हूँ ।