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Wednesday, November 11, 2009

उठो !

साथियों उठो!
तुम नहीं जानते
क्या हुआ है?
तुम पथरीले खेतों में
सोना उगाने की
कोशिश करते हो..
और लोहा समझ कर
सरहद पर भेजते हो
अपने बच्चे....
तुम नहीं जानते
बच्चे लोहे के नहीं होते...
वे सरहद पर लोहा खाएँगे।
वे शहीद नहीं
सियासत के हाथों पिटे हुए
मोहरे होंगे...
और कल सरकारी दफ्तरों में
तुम्हारी बदहवाश बहुएँ
किस 'एंगल और फ्रेम' से
देखी जायेंगी ?
तुम नहीं जानते!
इसलिए उठो !
अपने पथरीले खेतों में
अब सोना नहीं...
लोहा उगाओ..!

(published)

5 comments:

Mithilesh dubey said...

बहुत ही उम्दा रचना । लाजवाब अभिव्यक्ति

sada said...

बहुत ही बेहतरीन रचना ।

ओम आर्य said...

बिल्कुल सही कहा है आपने ........ एक एक पंक्तियाँ सहीहै ........वो सोनेवालो अब तो जाग जाओ !

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति!

M VERMA said...

बहुत सुन्दर भाव की कविता. अत्यंत खूबसूरत